सोमवार, 14 मई 2012

मौत  तो यु ही बदनाम  है ...
वर्ना ....दर्द तो जिंदगी देती है।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

जिंदगी

जिंदगी भी कैसे-कैसे दिन दिखलाती है
कभी छोटा सा मजाक मुसीबत बन जाती है,
ना जाने कोई  जिंदगी,कैसी अबुज़ पहेली,
कभी सौतन तो कभी सहेली बन जाती है...

शनिवार, 23 जुलाई 2011

माँ



कब्र से निकल आया , मुर्दा कफ़न ओड़कर
पूछने लगा कहा चल दिए सब अकेला छोड़कर 
यार-दोस्त, सगे-सम्बन्धी कोई भी परिचित नहीं रुका
बीबी रोई, ठिठकी, अंत में चल दी मुह मोड़कर,
रोते रोते कहने लगा मुर्दा , वापस कब्र में लौटकर
आज अगर माँ होती तो नहीं जाती यु अकेला छोड़कर 

शनिवार, 29 जनवरी 2011

अगले जन्म मोहे "मुल्ला" कीजों

 आज मेरे अन्दर का अमित एक बार फिर मुझे परेशान करने लगा...वैसे तो मै इसे समझा-बुझाकर रखता हूँ लेकिन ये भी अजीब करेक्टर है....ना जाने कब किस और करवट बदलेगा, कुछ पता नही. आज, आज क्या कई दिनों से परेशान करके रखा है...बार-बार  कह रहा है....अमित कुछ लिखो यार....पर मेरा हमेशा की तरह अगला सवाल था आखिर क्या.....

आखिर सवाल का जवाब मिल ही गया...
एक दिन मेरे एक दोस्त ने बरबस ही मुझसे पूछ लिया ...यार अगर तुम्हारा  अगला जन्म हो तो तुम क्या बनना चाहोगे...मैंने कहा यार अजीब बात करते हो.इस जन्म में तो अभी तक कुछ बना ही नही और तुम अगले जन्म की बाते करने लग गए..लेकिन वो भी मियां कहा मानने वाले थे ...बोला ... यार! बस ऐसे ही पूछ रहा हूँ.. तो मैंने भी ऐसे ही जवाब दे दिया .. मैं बोला, यार ! अगले जन्म में मैं "मुल्ला" बनना चाहूँगा...मियां ने फिर अगला सवाल दाग दिया .."मुल्ला" !!! मुल्ला ही क्यों ..मैंने भी कह दिया बस ऐसे ही !!!फिर अगला सवाल मेरी और रुख कर चुका  था..."कोई कारण तो होगा?" मैंने कहा जब तुम्हारे सवाल पूछने का कोई कारण नही था तो फिर मेरे जवाब का कोई कारण कैसे हो सकता है ...."ऐसे" सवालो के तो  "ऐसे" ही जवाब होते है...बेचारा शांत हो गया..लेकिन मुझे अशांत कर गया.....तभी तो इतना लिखना पड़ रहा है.

यह जवाब किसी कारण विशेष का परिणाम नही था...ना ही इसके बीज मेरे दिमाग के किसी कोने में पहले से अंकुरित हो रहे थे. यह तो बस , एक "ऐसे" ही सवाल का "ऐसा" ही जवाब था.लेकिन ये जवाब कोई साधारण जवाब नही था..ये मुझे बाद में पता चला..अब आप पूछेंगे की आखिर, क्यों ये जवाब कोई साधारण जवाब नही है?..वे कौन सी चीज़े है जो इसे आसाधारण जवाब बना देती है.
तो चलिए इन सवालो के तर्कसहित उत्तर दे देता हूँ...हम जैसे लोगो में एक आदत होती है की हम तर्कहीन चीजों में भी तर्क की तलाश करते है...क्यूंकि विश्वास के बिज़ अगर तर्क की पृष्ठभूमि में अंकुरित हो तो वे दीर्घायु हो जाते है..ऐसा हम जैसे लोग मानते है...
अब सोचिये अगर आपको अगले जन्म में अपनी पसंद से कुछ बनने का मौका दिया जाये तो आप कुछ  बेहतर ही चुनेगे ना..तो मैंने भी कुछ बेहतर ही चुना है...भले ही अनजाने में ही क्यों नही!!!!!
अब आपके दिमाग के जंतु इन सवालो को शब्दों का रूप दे रहे होंगे" आखिर इसमें बेहतर क्या है???..
देखिये श्रीमान/ श्रीमतीजी इसमें काफी फायदे है....
हाँ, आपको एक चीज़ तो बताना भूल गया मैं "टिपिकल मुल्लाओ" की बात कर रहा हूँ...कोई मतभेद नही होना चाहिए..मैं गुटनिरपेक्ष व्यक्ति हूँ...

फायदा न.वन तो शादियों के मामले में होता है...आप बिना रोक-टोक दो-तीन शादिया कर सकते है..अब आप कहेंगे ये कौन सा फायदा है...देखिये महोदय/महोदया जी हमारी लोकतंत्र में बड़ी आस्था है ..हम हर उस चीज़ के हिमायती है जिससे लोकतंत्र को मजबूती मिले..अगर आप दो-तीन शादिया करते है तो लोकतंत्र को काफी बल मिलता है..  .कैसे?  देखिये दो-तीन शादिया करने से एकाधिकार (Monopoly) ख्त्म हो जाता है...एकाधिकार (Monopoly) ख्त्म होने से प्रतियोगिता (Competition) बढती है और अन्त्ततः प्रतियोगिता बढने से सेवाओ(Service) की गुणवत्ता बढ़ जाती है.आखिर एक मजबूत लोकतंत्र का बाज़ार बेहतर सेवाओ के बिना कैसे चल सकता है. टेलिकॉम जगत में नंबर पोर्टेबिलिटी की सुविधा तो अब आई है , मिया यहाँ तो इन "कठ्मुल्लाओ"ने तो पहले से ही लागू कर रखी  है..

फायदा न.दो...ये भी शादियों वाला ही फायदा है..उम्र की तो कोई बंदिश ही नही रह जाती.."दिल कभी बूढ़ा नही होता" इस वाक्य में "मुल्लाओ" का अटूट विश्वास है और ये विश्वास आज तक अटूट है.ना जाने ये अटूट विश्वास "तर्क" की कौन सी पृष्ठभूमि में अंकुरित हुआ था की इतना "दीर्घायु" हो गया की इसकी "आयु" खत्म ही नही हो रही.और आख़िरकार " दिल तो बच्चा है जी"... मैं नही कह रहा हूँ सारी दुनिया कह रही है जी..

फायदा न.तीन...अब मैं "अर्थ का विद्यार्थी रहा हूँ ..तो "अर्थ" के भी फायदे बता देता हूँ...देखिये सरकार की कोई भी निति हो , "आम इंसान" को फायदा हो ना हो इन्हें जरूर हो जाता है..अब इतनी सारी छूट (Subsidy) का फायदा लेने वाला कोई तो होना ही चाहिए ना...जनतंत्र में "जन" के बिना "तंत्र" कैसे चल सकता है. आखिर इनसे बेहतर और कौन "जन" हो सकता है..

अब बात करते है अन्य सुविधाओ की ...अन्य सुविधाए तो अनंत है, क्या गिनती करू. और अगर आपको कोई सुविधा अच्छी नही लगती है तो आप कभी भी "फतवा" जारी करवा सकते है ...आखिर "मूलभूत अधिकार" नाम की कोई चीज़ है की नही...और मैं भी "मूलभूत अधिकारों" का हनन बिलकुल भी बर्दास्त नही करता ..."सविधान" का तो हमने सदैव "सन्मान" किया है.
वैसे फायदे तो बहुत से है बस पारखी नज़र चाहिए. अब मैं कोई सुनार तो हूँ नही..जो छोटे-मोटे फायदे थे मैंने बता दिया..अब आपको भी कोई फायदा मालूम हो तो स्वागत है...आखिर "कमेन्ट बॉक्स" किस दिन काम आएगा ...अब आप बताइए , आप अगले जन्म में क्या बनना चाहेंगे.

Disclaimer: कोई प्रॉब्लम नही होनी चाहिए..मैं "टिपिकल मुल्लाओ" की बात कर रहा हूँ.





रविवार, 12 दिसम्बर 2010

हसीन मौत

जिंदगी में दो मिनट भी कोई मेरे पास ना बैठा
और आज सब मेरे पास बैठे जा रहे थे-------

कभी किसी ने कोई तोहफा तक ना दिया
और आज फूल ही फूल दिए जा रहे थे--------

तरस गए हम किसी के दिए एक कपडे को
और आज नए-२ कपडे पहना रहे थे--------

दो कदम भी ना चला कोई साथ मेरे
और आज काफिला बनाकर ले जा रहे थे--------

आज पता चला मौत इतनी हसीन होती है
कमबख्त हम य़ू ही जिए जा रहे थे--------

बृहस्पतिवार, 19 अगस्त 2010

पीपली लाइव but farmer dead

                 आमिर खान....नयी फिल्म....पीपली लाइव.....! आमिर खान कि फिल्म.....और चर्चा न हो......ये शायद अब नियति को मंजूर नही.हाल ही में रिलीज़ फिल्म पीपली लाइव चर्चा में है.विषय ही कुछ ऐसा है- किसानो कि आत्महत्या- चर्चा तो होगी ही..और उसपर आमिर खान कि फिल्म..... इस फिल्म में आमिर ने बतौर कलाकार कोई किरदार नही निभाया है लेकिन वे इस फिल्म के प्रोडूसर है.
                                         पीपली लाइव आज चर्चा में है..लेकिन जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते है वैसे ही इस फिल्म को लेकर भी दो गुट  बन गए है...एक तरफ तो फिल्म का जोरदार स्वागत हो रहा है तो वही दूसरी तरफ फिल्म के विरोध में मोर्चे निकाले जा रहे है.अब आप शायद ये सोचे कि मैं कौन गुट में हूँ ..तो भाई हम "गुट निरपेक्ष" है.                                                                                                                      
चलिए आगे बड़ते है और ज्ञानवर्धन करते हुए फिल्म के बारे में जानते है...फिल्म कि कहानी 'नत्था' नामक एक किसान के इर्द-गिर्द घुमती है. नत्था एक गरीब किसान है, जिसकी जमीन बैंक के पास  गिरवी रखी है. कर्ज वापस ना करने के कारण उसकी जमीन कि नीलामी कि नौबत आ जाती है. हमेशा कि तरह एक गरीब किसान अपनी जमीन बचाने कि वो सारी कोशिसे करता है जो उसके लिए संभव है..लेकिन नतीजा वही " डाख के तीन पात". लेकिन , चूँकि फिल्म आमिर खान कि है इसलिए फिल्म का नायक यानि नत्था एक संभावना कि तलाश करता है जिससे शायद जमीन को नीलाम होने से बचाया जा सके.और ये संभावना थी , या तरकीब कह लीजिये, या आखिरी कोशिस ........"आत्महत्या". जी हाँ, नत्था को  आत्महत्या में जीवन नज़र आने लगता है...क्योंकि आत्महत्या के बाद मुआवजे कि रकम से गिरवी जमीन को छुड़ाया जा सकता था...बस यही से फिल्म रफ़्तार पकड़ लेती है ....आत्महत्या कि खबर जंगल में आग कि तरह फ़ैल जाती है...और शुरू होता है "नंगा नाच"...  नंगा नाच मीडिया का...  नंगा नाच प्रशासन का...  नंगा नाच समाज के ठेकेदारों का..राजनीतिज्ञों का ....बस यही है फिल्म कि कहानी ....और "नंगा नाच" आप सिनेमाघरों में जाकर के देखे तो बेहतर होगा....

फिल्म कि कहानी का ताना-बना भले  ही किसानो कि आत्महत्या के इर्द-गिर्द बुना गया हो ....लेकिन ये फिल्म यक़ीनन प्रशासन, मीडिया, राजनीतिज्ञों को आइना दिखाती है...फिल्म आइना दिखाती है कि है कि " इंडिया शाइनिंग" सिर्फ फाइल में है भारत तो आज भी " बंजर जमीन में खड्डे खोदकर १५ रूपए कि मिटटी बेचता है ...ताकि उसका पेट भर सके" आत्महत्या करने वाला किसान मीडिया के किये खबर है लेकिन "खड्डे खोदकर" रोज मरने वाला किसान नही...जब प्रशासन  पर संकट आता है तो उन्हें "लाल बहादुर , जवाहर , इंदिरा और अन्नपुर्णा कि याद आती है". टीआरपी कि अंधी  दौड़ मीडिया को " मल विश्लेषण" पर  मजबूर कर देती है...और रही बात राजनीतिज्ञों कि उन्हें तो बस अपनी रोटियों को सेकने के लिए गरम तवे का इंतज़ार रहता है... आज भारत का किसान आत्महत्या कर रहा है या नही..ये बहस का मुद्दा हो सकता है ...लेकिन उनके अन्दर का किसान जरूर आत्महत्या कर रहा है....

पेट भरता वो सभी का, जब फाड़े धरती का सीना,
शांत करता सबकी षुधा को जब बहाता अपना पसीना,
पेट भी गिरवी है जिसका और गिरवी है मकान 
वो और कोई नही , है भारत का ....किसान