आमिर खान....नयी फिल्म....पीपली लाइव.....! आमिर खान कि फिल्म.....और चर्चा न हो......ये शायद अब नियति को मंजूर नही.हाल ही में रिलीज़ फिल्म पीपली लाइव चर्चा में है.विषय ही कुछ ऐसा है- किसानो कि आत्महत्या- चर्चा तो होगी ही..और उसपर आमिर खान कि फिल्म..... इस फिल्म में आमिर ने बतौर कलाकार कोई किरदार नही निभाया है लेकिन वे इस फिल्म के प्रोडूसर है.
पीपली लाइव आज चर्चा में है..लेकिन जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते है वैसे ही इस फिल्म को लेकर भी दो गुट बन गए है...एक तरफ तो फिल्म का जोरदार स्वागत हो रहा है तो वही दूसरी तरफ फिल्म के विरोध में मोर्चे निकाले जा रहे है.अब आप शायद ये सोचे कि मैं कौन गुट में हूँ ..तो भाई हम "गुट निरपेक्ष" है.
चलिए आगे बड़ते है और ज्ञानवर्धन करते हुए फिल्म के बारे में जानते है...फिल्म कि कहानी 'नत्था' नामक एक किसान के इर्द-गिर्द घुमती है. नत्था एक गरीब किसान है, जिसकी जमीन बैंक के पास गिरवी रखी है. कर्ज वापस ना करने के कारण उसकी जमीन कि नीलामी कि नौबत आ जाती है. हमेशा कि तरह एक गरीब किसान अपनी जमीन बचाने कि वो सारी कोशिसे करता है जो उसके लिए संभव है..लेकिन नतीजा वही " डाख के तीन पात". लेकिन , चूँकि फिल्म आमिर खान कि है इसलिए फिल्म का नायक यानि नत्था एक संभावना कि तलाश करता है जिससे शायद जमीन को नीलाम होने से बचाया जा सके.और ये संभावना थी , या तरकीब कह लीजिये, या आखिरी कोशिस ........"आत्महत्या". जी हाँ, नत्था को आत्महत्या में जीवन नज़र आने लगता है...क्योंकि आत्महत्या के बाद मुआवजे कि रकम से गिरवी जमीन को छुड़ाया जा सकता था...बस यही से फिल्म रफ़्तार पकड़ लेती है ....आत्महत्या कि खबर जंगल में आग कि तरह फ़ैल जाती है...और शुरू होता है "नंगा नाच"... नंगा नाच मीडिया का... नंगा नाच प्रशासन का... नंगा नाच समाज के ठेकेदारों का..राजनीतिज्ञों का ....बस यही है फिल्म कि कहानी ....और "नंगा नाच" आप सिनेमाघरों में जाकर के देखे तो बेहतर होगा....
फिल्म कि कहानी का ताना-बना भले ही किसानो कि आत्महत्या के इर्द-गिर्द बुना गया हो ....लेकिन ये फिल्म यक़ीनन प्रशासन, मीडिया, राजनीतिज्ञों को आइना दिखाती है...फिल्म आइना दिखाती है कि है कि " इंडिया शाइनिंग" सिर्फ फाइल में है भारत तो आज भी "
बंजर जमीन में खड्डे खोदकर १५ रूपए कि मिटटी बेचता है ...ताकि उसका पेट भर सके" आत्महत्या करने वाला किसान मीडिया के किये खबर है लेकिन "
खड्डे खोदकर" रोज मरने वाला किसान नही...जब प्रशासन पर संकट आता है तो उन्हें "
लाल बहादुर , जवाहर , इंदिरा और अन्नपुर्णा कि याद आती है". टीआरपी कि अंधी दौड़ मीडिया को "
मल विश्लेषण" पर मजबूर कर देती है...और रही बात राजनीतिज्ञों कि उन्हें तो बस अपनी रोटियों को सेकने के लिए गरम तवे का इंतज़ार रहता है... आज भारत का किसान आत्महत्या कर रहा है या नही..ये बहस का मुद्दा हो सकता है ...लेकिन उनके अन्दर का किसान जरूर आत्महत्या कर रहा है....
पेट भरता वो सभी का, जब फाड़े धरती का सीना,
शांत करता सबकी षुधा को जब बहाता अपना पसीना,
पेट भी गिरवी है जिसका और गिरवी है मकान
वो और कोई नही , है भारत का ....किसान